इस तथ्य को कोई भी न्यायालय कैसे नज़रंदाज़ कर सकता है कि विवादास्पद शराब नीति को दिल्ली सरकार की कैबिनेट जिसके मुखिया स्वयं केजरीवाल हैं , के द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई थी इसलिए वह तो बिना किसी संदेह के इस नीति के चलते हुए घोटाले के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार तो होंगे ही। दिल्ली शराब घोटाले के बारे में शुरू से ही यह स्पष्ट था कि मुख्यमंत्री केजरीवाल इसके लिए सीधे सीधे ज़िम्मेदार हैं और घोटाले के किंगपिन हैं क्योंकि जब कभी किसी भी नीति विषयक निर्णय के चलते कोई घोटाला या भ्रष्टाचार होता है तो उसकी सीधी ज़िम्मेदारी मुख्यमंत्री की होती है।
वी यस पाण्डेय
हमारे देश की व्यवस्था को चला चुके और इसपर वर्षों तक नज़र रखे लोगों का यह कहना रहा है कि हमारे देश में कुछ भी कार्य असम्भव नहीं है । ऐसा ही कुछ केजरीवाल के ज़मानत पर रिहा करने वाले निर्णय के सम्बंध में चर्चा है । इन्ही केजरीवाल के मामले में सर्वोच्च न्यायालय और हाई कोर्ट ने प्रथम दृष्टया उनके इस घोटाले में शामिल होने के काफ़ी सबूत पाए और केजरीवाल को उनके करोड़ों की फ़ीस लेने वाले वकील भी जेल से बाहर लाने में असफल हो गए । मनी लॉंडरिंग के मामले में जेल में बंद केजरीवाल पर शराब घोटाले में सौ करोड़ की रिश्वत लेकर उसका प्रयोग गोवा के विधान सभा चुनावों में किए जाने का आरोप है । इन आरोपों के समर्थन में ढेर सारे सबूत प्रवर्तन निदेशालय द्वारा विभिन्न न्यायालयों में प्रस्तुत किए जा चुके हैं जिसके परिणाम स्वरूप इस मामले में जेल में बंद मनीष सिसोदिया एवं अन्य आरोपियों को तमाम कोशिशों के बाद भी नीचे से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक से ज़मानत नहीं मिली। स्पष्टतः शराब घोटाला को एक गम्भीर रिश्वत खोरी से जुड़ा घोटाला सभी न्यायालयों ने माना और प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी हाल ही में न्यायालय में दाखिल चार्जशीट में केजरीवाल को इस शराब घोटाले का सरग़ना कहा और उसके समर्थन में सबूत भी पेश किए ।इन तथ्यों के प्रकाश में और मनी लॉंडरिंग ऐक्ट की धारा ४५ की व्यवस्थाओं को दरकिनार करके केजरीवाल को ज़मानत देने के निर्णय पर रोक लगाकर हाई कोर्ट ने न्याय पूर्ण आदेश पारित किया है।
इस तथ्य को कोई भी न्यायालय कैसे नज़रंदाज़ कर सकता है कि विवादास्पद शराब नीति को दिल्ली सरकार की कैबिनेट जिसके मुखिया स्वयं केजरीवाल हैं , के द्वारा स्वीकृति प्रदान की गई थी इसलिए वह तो बिना किसी संदेह के इस नीति के चलते हुए घोटाले के लिए सीधे तौर पर ज़िम्मेदार तो होंगे ही। दिल्ली शराब घोटाले के बारे में शुरू से ही यह स्पष्ट था कि मुख्यमंत्री केजरीवाल इसके लिए सीधे सीधे ज़िम्मेदार हैं और घोटाले के किंगपिन हैं क्योंकि जब कभी किसी भी नीति विषयक निर्णय के चलते कोई घोटाला या भ्रष्टाचार होता है तो उसकी सीधी ज़िम्मेदारी मुख्यमंत्री की होती है।
इतने स्पष्ट तथ्यों और सबूतों के बाद भी दिल्ली शराब घोटाले को फ़र्ज़ी बताने का खेल काफ़ी लम्बे समय से चलाया जा चुका है लेकिन यह साफ़ है कि झूट बोल कर बच निकलने की अब कोई गुंजाइश केजरीवाल के पास नहीं बची है और उनको अपने किए का दंड भुगतना ही पड़ेगा और केजरीवाल सहित अन्य सभी आरोपी भी क़ानून के चंगुल से बच नहीं सकते । झूट बोलने की भी एक सीमा होती है और उस सीमा को केजरीवाल कई बार लांघ चुके है । समय आ गया है कि वह इस सच्चाई को स्वीकार कर लें कि अपनी निरंकुश राजनीतिक महत्वकांक्षा के चलते वह रिश्वतख़ोरी का अपराध कारित कर चुके है और अब किए गए अपराध का दंड भोगने का समय आ गया है और उससे वह झूट का सहारा ले कर और यह कह कर कि छापों में “ चवन्नी “ तक नहीं मिली , वह बच नहीं सकते ।यही बात अब उनकी पार्टी के नेताओं के भी समझ में भी आ जानी चाहिए कि वह अब दिन भर झूठ का पुलिंदा पेश करना बंद कर दें , सच्चाई को स्वीकार करें , की गई ग़लतियों को सुधारें , अपने बीच के जो भी लोग भ्रष्टाचार में लिप्त दिखें , उनका परित्याग करें और ईमानदार, सच्चे नेतृत्व को आगे करें । इस के अलावा पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं के पास भी अब कोई रास्ता नहीं बचा है । शतुर्मुर्ग की तरह रेत में अपना सर गड़ा लेने से विपत्ति दूर नहीं होती ।
अपना स्वार्थ सिद्ध करने का केजरीवाल द्वारा झूट का सहारा लिया जाना उनका कोई पहला कारनामा नहीं है , ऐसा वह सदैव से करते आएँ हैं। अंत में झूठ का भांडा तो फूटना ही था , और वह शराब घोटाले के रूप में फूटा । इस शराब घोटाले के अलावा भी केजरीवाल पर भ्रष्टाचार के अनेकों आरोप लगे हुए हैं जिनकी जाँच जारी है । इतना ही नहीं , केजरीवाल पर तो देश विरोधी ताक़तों से साँठगाँठ करने और उनसे करोड़ों का चंदा वसूलने के भी अत्यंत गम्भीर आरोप लगे हैं जिनकी जाँच के आदेश हो चुके हैं और आशा की जानी चाहिए कि इस गम्भीर मामले की त्वरित और निष्पक्ष जाँच शीघ्रातिशीघ्र पूरी की जाए ताकि जो भी दोषी हो उसे दंडित किया जा सके।
केजरीवाल प्रकरण के तथ्य इस ओर भी इंगित करते हैं कि हमारे देश का राजनीतिक वर्ग वर्षों से भ्रष्टाचार में लिप्त रहने के बावजूद भी क़ानून की पकड़ से दूर रहा है इस लिए उसको यह ग़लतफ़हमी हो गई है कि वे अपनी राजनीतिक ताक़त के बूते पर पर क़ानून की गिरफ़्त से बचे रहने में सदैव सफल रहेंगे । लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि बड़े बड़े राजनीतिक सूरमा जेल की हवा काट चुके हैं और इसलिए भ्रष्टाचार का मार्ग त्याग देने में ही सभी की भलाई है
(विजय शंकर पांडे भारत सरकार के पूर्व सचिव हैं)

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