स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से क्या देश में कोई ऐसा पैदा नहीं हुआ जिसके कंधों पर देश का भार डाला जा सके और जो देश निर्माण के लिए अपेक्षित हिम्मत, दूरदर्शिता , ईमानदारी और दृढ़ इच्छाशक्ति प्रदर्शित कर पाया हो ।लगता तो ऐसा ही है नहीं तो हमारे देश के नेताओं को गांधी जी , नेहरू , पटेल , बाबा साहब अंबेडकर आदि का नाम ले कर आज भी अपनी अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने की जरूरत ना पड़ती । देश के संविधान की दिन रात दुहाई देने वाले सभी दलों के सभी नेताओं को कभी भी संविधान का प्राण “ कानून के राज “ की याद क्यों नहीं आती ।भ्रष्टाचार में दिन रात लिप्त रहते हुए और दिन में कई कई बार झूठ बोलने वालों को तब संविधान क्यों नहीं याद आता ?
वी यस पाण्डेय
आज की राजनीति कितने निचले स्तर तक गिर गई है उसका उदाहरण आज कल देश की विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के बीच चल रहा वाक् युद्ध है । मुद्दा सिर्फ़ दशकों पहले गुज़र चुके नेताओं ने कब क्या कहा और कब क्या किया, ही बचा है ।आज के सभी दलों के नेता पिछले दो -तीन दशक से देश के सर्वोच्च स्तर की राजनीति में सक्रिय रहे हैं और समय समय पर सत्ता की चासनी चाट चुके हैं । अपने अपने कार्य काल का विश्लेषण करने की जहमत यह लोग अगर उठा लें या पीछे जाकर अपने आचरण और करतूतों का जायजा लें तो निश्चित रूप से सभी को शर्मसार होना ही पड़ेगा । जिस जनता और संविधान की दुहाई देकर यह सभी सत्ता पर आसीन हुए , उसका क्या हाल हो गया है इसको तो अब बताने वाला भी कोई नहीं बचा है । झूँट बोलना और फिर उस झूँट को कुतर्कों से सही सिद्ध करने की कला तो हमारे देश की राजनीति का अभिन्न अंग सा बन गया है लेकिन उससे भी बड़ी त्रासदी तो यह है कि लोक तंत्र का चौथा खंबा कहलाने वाले लोग इस झूँट को सच सिद्ध करने में अपनी बची खुची पेन की निब को भी तोड़ने पर आमादा हैं ।
इन हालात में आज देश की नैया के खेवनहार महात्मा गांधी , नेहरू , पटेल , अंबेडकर आदि तो बन नहीं सकते क्योंकि यह लोग अपने अपने समय में अपनी अपनी सोंच के अनुरूप अपना अपना काम करके चिर विश्राम को प्राप्त हो चुके हैं इसलिए आज देश की नैया तो वर्तमान के लोगों के हाथ ही है , कोई चाहे या ना चाहे । कल के खेवनहार दशकों पहले परिदृश्य से बाहर होने के बाद भी आज भी देश की राजनीति की राह तय कर रहे, यह अगर दुर्भाग्य पूर्ण नहीं तो और क्या है । स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से क्या देश में कोई ऐसा पैदा नहीं हुआ जिसके कंधों पर देश का भार डाला जा सके और जो देश निर्माण के लिए अपेक्षित हिम्मत, दूरदर्शिता , ईमानदारी और दृढ़ इच्छाशक्ति प्रदर्शित कर पाया हो ।लगता तो ऐसा ही है नहीं तो हमारे देश के नेताओं को गांधी जी , नेहरू , पटेल , बाबा साहब अंबेडकर आदि का नाम ले कर आज भी अपनी अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने की जरूरत ना पड़ती । देश के संविधान की दिन रात दुहाई देने वाले सभी दलों के सभी नेताओं को कभी भी संविधान का प्राण “ कानून के राज “ की याद क्यों नहीं आती ।भ्रष्टाचार में दिन रात लिप्त रहते हुए और दिन में कई कई बार झूठ बोलने वालों को तब संविधान क्यों नहीं याद आता ?
जब कहीं भी यह यक्ष प्रश्न राजनीतिक दलों और उनके नेताओं के सामने आता है तो यह सभी शर्मिंदा होकर अपनी गलती मानने के बजाय यही तर्क देते मिलते हैं कि हम लोग क्या करें देश की जनता ही इन स्थितियों के लिए दोषी है क्योंकि वह बिना सोंचे समझे सिर्फ लालच ,पैसे , शराब , जाति , धर्म आदि के आधार पर ही वोट देती है । यह तर्क ना केवल ग़लत एवं बेमानी है बल्कि सत्यता के पूर्णतः परे है ।आम जनता की दृष्टि में चूंकि सभी राजनीतिक दल और उनके नेता एक ही थैली के चट्टे बट्टे है तो उनको सही – ग़लत देख कर चुनाव करना अगर नामुमकिन नहीं तो मुश्किल अवश्य है ।जनता की यह धारणा वास्तविकता के अनुरूप प्रतीत होती है ।
ऐसे हालात में भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी देश की राजनीतिक व्यवस्था को सुधारने की शुरुवात एक टेंढ़ी खीर ही लगती है । देश के राजनीतिक परिदृश्य पर , इक्का -दुक्का अपवाद को छोड़ कर ,ईमानदार नेताओं की भरी कमी हमारे देश की सबसे बड़ी समस्या है और इस समस्या की ओर से आँख मूँद कर बैठे रहना देश के लिए अत्यंत अहितकारी हैं । किसी भी मर्ज की दवा तभी संभव है जब मर्ज की पहचान हो और यह स्वीकारोक्ति हो कि मर्ज गंभीर है जिसका इलाज तुरंत करना जरूरी है । देश की सर्वोच्च कुर्सियों पर विराजमान लोग तो भ्रष्टाचार को समस्या मानते ही नहीं तो उसका इलाज कैसे होगा?
आज की राजनीति बेतुके सवालों पर इसी लिए अंटकी है क्योंकि दशकों से जनता और देश के सामने मुंह बाये खड़े असली सवालों का किसी भी नेता या उसकी पार्टी के पास कोई जवाब नहीं है । इसी लिए जनता को भ्रमित करने और मूल समस्याओं से ध्यान भटकाने के लिए कभी सावरकर तो कभी नेहरू और कभी बाबा साहब अंबेडकर तो कभी पटेल , कभी जनगणना , कभी मंदिर -मस्जिद , कभी दायें – बायें आदि आदि का सहारा लिया जाता है । इसी प्रकार के निरर्थक मुद्दों , बयानों , घटनाओं , का सहारा लेकर चुनावी नैया पार करने की जुगाड़ में देश के सभी राजनीतिक दल वर्षों से लगे हुए हैं और इस बनावटी प्रतिस्पर्धा में कभी कोई तो कभी कोई बाजी मार कर सत्ता का सुख प्राप्त करने में सफल हो जाता है । वहीं सारे देश की मीडिया अमुक दल की सफलता और अन्य की असफलता का वर्षों तक परीक्षण करते करते नहीं थकते । देश को इस भ्रष्टाचार और झूठ पर आधारित राजनीतिक त्रासदी से कब और कैसे मुक्ति मिलेगी , इसका उत्तर आज आसान नहीं लगता लेकिन यह तो अटल सत्य है कि लोक तंत्र की सफलता सिर्फ़ आम जन के ही हाथ में है । महात्मा गांधी का यह मूल मंत्र भी यदि देश के तंत्र पर सवार लोग याद रख लें तो भी काफ़ी कुछ सुधार हो सकता है कि- “भूल करने में पाप तो है ही, परंतु उसे छुपाने में उससे भी बड़ा पाप है।”

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